शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

मेरे दादा जी ( स्व. श्री मोतीराम खरे ) जिन्हे हमने बचपन में ही खो दिया था , मगर  उनके किस्से हमने सुने हैं ,
वो नियम  कायदे कानून में बिलकुल "विरासत" फिल्म के अनिल कपूर के जैसे थे , सफ़ेद धोती सफ़ेद कुर्ता
नीली जैकेट  और कंधे पर सफ़ेद गमछा  उनका हमेशा  यही परिधान था।
गॉव में पंचो के मुखिया भी थे ,आसपास के दस गॉंवों में उनका नाम प्रसिद्ध था ,मान सम्मान धन दौलत ,जमीं
जायदाद में सबसे आगे ,गॉव के आधे हिस्से में तो हमारे दादा जी ने मकान बना रखे थे  मगर पूरी ईमानदारी से
कंही भी कोई छल कपट  नहीं था ,वो सबसे ज्यादा  अपनी ईमानदारी के लिये ही प्रसिद्ध थे।
आस पास के दस गॉव में भी कोई गलत काम करने से डरता था ,गलत लोगों के प्रति इतना डर भी बना रखा था

                  जहाँ तक मैंने सुना है  ये सारा बैभव  उन्हें विरासत में नहीं मिला था  उन्होंने सब अपनी मेहनत से बनाया था , रुतवा इतना था कि  जो बोल दिया मतलब  हो गया , बात कोई टाल नहीं सकता था , उनकी बात
पत्थर की लकीर बन जाती थी।
                   जब तक वो थे , हमारे घर में तो  ठीक  आसपास के गॉवों में लोग  गलत काम करने से घबराते थे
कि  अगर  दादाजी को पता चल गया तो हमारी खैर नहीं।
दादाजी के जाने के बाद  यही रुतवा मेरे पिताजी स्व. श्री लखन लाल खरे  ने भी बना कर रक्खा था , लेकिन
वो सारा बैभव  अब तीन हिस्सों में  बट चुका था , मेरे दो चाचा( श्री दीनदयाल खरे  एवं राजू खरे ) और मेरे  पिताजी  के बीच  कभी  कोई मतभेद नहीं रहा , लेकिन  परिवार जब तीन टुकड़ों   में टूटता है तो समाज की
नजर में वो प्रभाव  भी कम हो जाता है।
                  समय अपनी गति से चलता रहा मगर  मेरे पिताजी के  जीवन में कुछ ऐसी परिस्थितियां बनी  कि
अपने  हिस्से  की सारी  विरासत  मिटानी पड़ी।
                  समाज और  गॉव वालों को इस बात का अफ़सोस होता है पर मुझे नहीं, क्योंकि
विरासत जरूर एक दिन ख़त्म हो  सकती है पर  हुनर नहीं ,और हुनर से एक नई शुरुआत की जा सकती है।


गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

काश  हमारे बचपन में  स्मार्टफोन  होते
तो हम वो  हसीन पल कैप्चर  कर  पाते

बचपन में अक्सर  गॉव के सारे बच्चे  कभी इमली के पेड़ के नीचे , कभी आम के पेड़ के नीचे
गर्मियों की छुट्टियों में खेला करते थे , और मैं सभी बच्चों का  लीडर हुआ करता था।
असल जिंदगी तो  बचपन की ही होती है  न कोई फ़िक्र न कोई चिंता  बस अपनी धुन में मस्त मगन
और अगर  बचपन  पेड़ों की छाँव  बाग बगीचों और नदियों के किनारे  गुजरा हो तो  साहब  यादें  तो
सुनहरी  होंगी , लेकिन अफ़सोस  अब  शहरों से  नाता  मेरा है , जहाँ अब वो हसीन पल नसीब नहीं  हैं

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

जय  श्री राम
जय हनुमन्ते

आज हनुमान  जयंती है
हनुमान जी ही एक ऐसे भगवान हैं जो आज भी  पृथ्वि  पर सजीव हैं , और ये अपने भक्तों की रक्षा
के लिए आज भी ततपर हैं

और देवता चित्त न धरई
हनुमत सेई सर्व सुख करई

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

गर्मिंयों की छुट्टियों  में  कंचे भी बड़े खेले हैं
हार जीत के सिलसिले भी झेले हैं
और कुर्सी टेबल पर बैठकर सोचते हैं
 हम आज कितने अकेले हैं
बचपन में बारिश का पानी
हर दिन   नई इक  कहानी
खेतों में खेलों में हम थे मगन
कभी जीत अपनी कभी हार मानी

सुना है  एकता में बल है पर  सुश्री  हमारे सामने कभी आती ही  नहीं
मालूम है  हमें के हम पर कोई गौर नहीं  फरमाता है
इस बात से बस इतना ही समझ लो के
हमें दिखावा करना नहीं  आता है

माना के कुछ न सही ,पर कुछ तो होगा ही  साहब
जो हमें बताना नहीं आता है

परेशानियों से तो हम भी जूझे हैं बहुत ,
पर हमें किसी को सताना नहीं आता है

नदी में नहाना  भी याद है
गीले कपड़े पहनकर
रस्ते में सुखना भी याद है
रोना भी याद है रुलाना भी याद है
अपने आप पर बच्चों को हसाना भी याद है
अपनी गलती पर दूसरे को फ़साना भी याद है
अपनी धुन में  वो गाना भी याद है
बस भूल गए हैं लोग ,बरना हमें तो
हर लम्हा बिताना भी याद है

दिलीप कुमार

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

हम जो बचपन  में किया करते थे ,मालूम भी नहीं था कि उसे किसी का मजाक उड़ाना कहते हैं
मैंने सुना है  जब मैं इस दुनिया में आया था  तभी मेरे गॉव में बिजली  आई थी
और घरवालों  ने मेरा नाम दीपक  रख दिया ,
अगर मैं लड़की होता  तो आप लोग सोच सकते हैं मेरा नाम क्या होता ?
किस्से बचपन के पुराने हैं
मगर आज भी सुहाने हैं
बदल गई हैं गलियाँ
फिर भी  याद वो जमाने हैं