मेरे दादा जी ( स्व. श्री मोतीराम खरे ) जिन्हे हमने बचपन में ही खो दिया था , मगर उनके किस्से हमने सुने हैं ,
वो नियम कायदे कानून में बिलकुल "विरासत" फिल्म के अनिल कपूर के जैसे थे , सफ़ेद धोती सफ़ेद कुर्ता
नीली जैकेट और कंधे पर सफ़ेद गमछा उनका हमेशा यही परिधान था।
गॉव में पंचो के मुखिया भी थे ,आसपास के दस गॉंवों में उनका नाम प्रसिद्ध था ,मान सम्मान धन दौलत ,जमीं
जायदाद में सबसे आगे ,गॉव के आधे हिस्से में तो हमारे दादा जी ने मकान बना रखे थे मगर पूरी ईमानदारी से
कंही भी कोई छल कपट नहीं था ,वो सबसे ज्यादा अपनी ईमानदारी के लिये ही प्रसिद्ध थे।
आस पास के दस गॉव में भी कोई गलत काम करने से डरता था ,गलत लोगों के प्रति इतना डर भी बना रखा था
जहाँ तक मैंने सुना है ये सारा बैभव उन्हें विरासत में नहीं मिला था उन्होंने सब अपनी मेहनत से बनाया था , रुतवा इतना था कि जो बोल दिया मतलब हो गया , बात कोई टाल नहीं सकता था , उनकी बात
पत्थर की लकीर बन जाती थी।
जब तक वो थे , हमारे घर में तो ठीक आसपास के गॉवों में लोग गलत काम करने से घबराते थे
कि अगर दादाजी को पता चल गया तो हमारी खैर नहीं।
दादाजी के जाने के बाद यही रुतवा मेरे पिताजी स्व. श्री लखन लाल खरे ने भी बना कर रक्खा था , लेकिन
वो सारा बैभव अब तीन हिस्सों में बट चुका था , मेरे दो चाचा( श्री दीनदयाल खरे एवं राजू खरे ) और मेरे पिताजी के बीच कभी कोई मतभेद नहीं रहा , लेकिन परिवार जब तीन टुकड़ों में टूटता है तो समाज की
नजर में वो प्रभाव भी कम हो जाता है।
समय अपनी गति से चलता रहा मगर मेरे पिताजी के जीवन में कुछ ऐसी परिस्थितियां बनी कि
अपने हिस्से की सारी विरासत मिटानी पड़ी।
समाज और गॉव वालों को इस बात का अफ़सोस होता है पर मुझे नहीं, क्योंकि
विरासत जरूर एक दिन ख़त्म हो सकती है पर हुनर नहीं ,और हुनर से एक नई शुरुआत की जा सकती है।
वो नियम कायदे कानून में बिलकुल "विरासत" फिल्म के अनिल कपूर के जैसे थे , सफ़ेद धोती सफ़ेद कुर्ता
नीली जैकेट और कंधे पर सफ़ेद गमछा उनका हमेशा यही परिधान था।
गॉव में पंचो के मुखिया भी थे ,आसपास के दस गॉंवों में उनका नाम प्रसिद्ध था ,मान सम्मान धन दौलत ,जमीं
जायदाद में सबसे आगे ,गॉव के आधे हिस्से में तो हमारे दादा जी ने मकान बना रखे थे मगर पूरी ईमानदारी से
कंही भी कोई छल कपट नहीं था ,वो सबसे ज्यादा अपनी ईमानदारी के लिये ही प्रसिद्ध थे।
आस पास के दस गॉव में भी कोई गलत काम करने से डरता था ,गलत लोगों के प्रति इतना डर भी बना रखा था
जहाँ तक मैंने सुना है ये सारा बैभव उन्हें विरासत में नहीं मिला था उन्होंने सब अपनी मेहनत से बनाया था , रुतवा इतना था कि जो बोल दिया मतलब हो गया , बात कोई टाल नहीं सकता था , उनकी बात
पत्थर की लकीर बन जाती थी।
जब तक वो थे , हमारे घर में तो ठीक आसपास के गॉवों में लोग गलत काम करने से घबराते थे
कि अगर दादाजी को पता चल गया तो हमारी खैर नहीं।
दादाजी के जाने के बाद यही रुतवा मेरे पिताजी स्व. श्री लखन लाल खरे ने भी बना कर रक्खा था , लेकिन
वो सारा बैभव अब तीन हिस्सों में बट चुका था , मेरे दो चाचा( श्री दीनदयाल खरे एवं राजू खरे ) और मेरे पिताजी के बीच कभी कोई मतभेद नहीं रहा , लेकिन परिवार जब तीन टुकड़ों में टूटता है तो समाज की
नजर में वो प्रभाव भी कम हो जाता है।
समय अपनी गति से चलता रहा मगर मेरे पिताजी के जीवन में कुछ ऐसी परिस्थितियां बनी कि
अपने हिस्से की सारी विरासत मिटानी पड़ी।
समाज और गॉव वालों को इस बात का अफ़सोस होता है पर मुझे नहीं, क्योंकि
विरासत जरूर एक दिन ख़त्म हो सकती है पर हुनर नहीं ,और हुनर से एक नई शुरुआत की जा सकती है।